Thursday, November 22, 2012

26/11 के बाद लिखी एक कविता 'सामूहिक बलात्कार का हलफनामा'

साल 2008 की बात है। मुंबई में 26/11 का आतंकवादी तांडव जिस तरह से टीवी पर दिखाया गया। उसे देखने के बाद मेरे अहसास एक कविता की शक्ल में ब्लॉग पर उतर आए थे। 29 नवंबर को जिस वक्त ये कविता लिखी, बेहद गुस्से में था। मगर आज 4 साल बाद जब पूरा देश एक ठंडी आह भरके मुंबई हमले में शामिल रहे पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब को फांसी दिए जाने से संतुष्ट नजर आ रहा है। मैं पता नहीं क्यों खुद को इस अंत से संतुष्ट नहीं कर पा रहा। पलट के अपनी कविता पढ़ी तो लगा इतना आसान नहीं है कसाब की फांसी से संतुष्ट हो जाना। मुंबई हमले का एक फ्लैशबैक...


Scene-1

ताज से धुआं निकल रहा है-
गोलियों की गड़गड़ाहट में-
उत्तेजना का संगीत कौंध रहा है-
कैमरों की निगाह से कुछ भी-
कहीं भी बच नहीं सकता-
पुलिस, सेना और पत्रकार- 
एकदम मुस्तैद...चौकस खड़े हैं-
जान जोखिम में डालकर-
बहुतों के सीने गर्व से फूले हुए हैं-
शायद चार या पांच इंच तक-

Scene-2

जिंदा बच गए लोग-
अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहे हैं-
हाय..! उन्हीं की लकीरों में लिखा था-
उन कायरों के सीने पर लटकना-
चमचमाता तमगा बनकर-
उन्हीं को देना था इकबालिया बयान-
देश की आर्थिक राजधानी के-
सामूहिक बलात्कार का।
उन्हें अपनी जिंदगी पर तरस आ रहा है-
मगर वो करते भी तो क्या-
मंदी के इस दौर में उनका बचना जरुरी था।

Scene-3

उधर मां के दूध से महरुम रहे कुछ हिजड़े -
मजबूर शिखंडियों की आड़ में-
एके 47 से आतिशबाजी में मशगूल हैं-
वो जानते हैं, खुदा उन्हें माफ कर देगा-
क्योंकि दुनिया में जेहाद जरुरी है-
और खून खराबा उनकी मजबूरी है-

Scene-4

वो देखो....उधर उस नरीमन हाउस को-
आखिरकार 41 घंटे में एक खंडहर-
आबाद हो गया है...काली वर्दी वालों से-
क्योंकि मातम का वक्त नहीं है-
इसलिए लाशों की गिनती जरुरी है-

Scene-5

एक लिजलिजा शेर भिनभिना रहा है-
कोतवाल भी अबकी सावधान है-
सूट बदलने का शौक नहीं फरमा सका-
सफेद कोट पहनी तो पहनी-
दिल्ली काफी दूर थी-
सो कालिख से काम चला लिया।

Scene-6

दुशासन को न्यौता भेजा है-
आखिर जांच तो होनी है-
भला उससे बेहतर कौन बता पाएगा-
अभी कितनी साड़ी बाकी है-

Scene-7 

चुनावी मौसम में-
कुछ सफेदपोश भेड़िये तो दिख गए-
पर, अभी तक धरतीपुत्र नजर नहीं आया-
शायद वो गिनने में जुटा है-
मारे गए लोगों में भइया लोग कितने हैं-
और बचाने वालों में मराठी कितने-

Scene-8

खैर, तमाशा खत्म होने को है-
और मैं परेशान हूं, हमेशा की तरह-
आखिर, अब क्या रह गया-
टीआरपी के तराजू में तोलने के लिए ।

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