(ये लेख भी साल 2008 में अपने ब्लॉग बहरहाल पर लिखा था। ये एक तरह से कबूलनामा है अपनी मजबूरी में की गई बेईमानी का। यूं तो कोई भी मजबूरी किसी बेईमानी को जस्टीफाई नहीं कर सकती, पर जिस वक्त ये बेईमानी की, बिल्कुल भी अहसास नहीं था कि कुछ गलत है इसमें)
साल 2003 की बात है। उस वक्त दिल्ली में बस का न्यूनतम किराया 3 रुपए कीबजाए 2 रुपए हुआ करता था। आईआईएमसी में 9 महीने का हनीमून खत्म हो चुका था। जिंदगी की क्रूरतम सच्चाईयों से रुबरु होने का वक्त आ चुका था। एक-एक रुपए की कीमत समझ में आने लगी थी। खर्चे बढ़ गए थे, मगर घर से मिलने वाला बेरोजगारी भत्ता जस का तस था। लिहाजा, जहां पैसे बचाए जा सकते थे, बचा लेतेथे। किसी की ईमानदारी की कीमत भला क्या हो सकती है। फिर भी लोग मानते हैं,बहुत मोटी रकम मिले तो बेईमानी को जस्टिफाई किया जा सकता है। मगर मैंने तो महज 3 रुपए के लिए कितनी ही बार अपनी ईमानदारी बेची है। जी हां, पचासों बार मैंने 5 रुपए के बदले 2 रुपए और 10 के बदले 7 रुपए का टिकट लेकर बस में सफरकिया है। ताकि 3 रुपए बच सकें... क्योंकि उस वक्त इन 3 रुपयों की कीमत बहुत ज्यादा थी...शायद आज के 500 रुपयों से भी ज्यादा। क्योंकि आमदनी का कोई दूसरा जरिया नहीं था, घर से जो पैसे मिलते थे.. उससे बस दिल्ली में जिंदा भर रहा जा सकता था। लेकिन 3 रुपए की बेईमानी भी आसान नहीं थी। इसके लिए बस स्टैंड पर जहां बाकी के लोग डीटीसी बसों का इंतजार कर रहे होते थे, मैं प्राइवेट बस की ताक में रहता। खाली से खाली डीटीसी बस आंखों के सामने से गुजर जाती मगर मैं खड़ा रहता...। क्योंकि मेरे जेहन में 3 रुपए बचाने की मजबूरी घुमड़ती रहती थी। यकीन मानिए.. 3रुपए बचाने के लिए इतना ज्यादा खून जलाना पड़ता था, जो 500 रुपएके मेवे खाकर भी नहीं बनता। मसलन, बस में चढ़ने के बाद सबसे पहले कंडक्टर से टिकट लेने तक मन में इतने बवंडर उठ रहे होते.. जिनका कोई हिसाब नहीं है। खुद को उस झूठ के लिए तैयार करना पड़ता... जो बेहद मामूली होती थी। टिकट लेने केदो तरीके होते हैं। पहला ये कि आप जगह का नाम बता दें। दूसरा ये कि आप सीधे बोल दें 2 रुपए का। अगर कंडक्टर सीधे तौर पर टिकट देदे तो ठीक पर कहीं वो पलटकर पूछ दे..।कहां जाना है.. तो समझिए... मन के भीतर भूचाल आ जाता था।कई बार तो झूठ बोलते हुए होंठ तक कांप जाते थे। मगर क्या करते, 3 रुपए बहुत होते थे उस जमाने में। टिकट लेने के बाद भी तब तक चैन नहीं होता, जब तक कि अपनी मंजिल तक ना पहुंच जाएं। लगता रहता कि कहीं कंडक्टर आकर पूछ ना दे भई तूने तो 2 का लिया था.. कहां तक जाएगा। लिहाजा, टिकट लेकर कोने में दुबके रहते। कहीं कंडक्टर का ध्यान ना चला जाए। यही नहीं, साथ सफर कर रहे लोगों से भी कई दफा नजर टकरा जाती तो लगता मानो वो पूछ रहा हो...अबे बेईमान 2 रुपएमें कहां तक जाएगा...। मगर क्या करते, पैसों की किल्लत....बेरोजगारी की अनिश्चितता भरी जिंदगी... और बेतहाशा बढ़ती महंगाई के बीच...3 रुपए अपनी औकात से कई गुना ज्यादा होते थे। जिस ईमानदारी को कोई करोड़ों में नहीं खरीद सकता... उसे खुद मैंने महज 3 रुपए में कितनी ही बार बेचा है..। अब सोचता हूं तो लगता है.. 3 रुपए भी कम नहीं होते....।

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