प्यार, हर किसी के लिए एक अलग अहसास है। इसकी
परिभाषाएं जुदा जुदा हो सकती हैं। रिश्ते नाते संबंध और समाज की बुनावट... भला
प्यार का इनसे क्या वास्ता। ये लव स्टोरी है, एक बच्चे
की... जिसकी कुल जमा उम्र 9 साल थी। चौथे दर्जे में पढ़ने वाले इस बच्चे की जिंदगी
में पहली बार टीवी दाखिल हुआ था। यूं तो वो पहले भी रामायण और महाभारत जैसे
सीरियल्स दूसरों के घर जाकर देखा करता था। मगर ऐसा पहली बार हुआ था कि टीवी खुद
उसके घर में हो। दरअसल पढ़ाई करने के लिए उसे अपनी बुआ के यहां भेज दिया गया था।
जहां उसके लिए टीवी ही सबसे बड़ी उपलब्धि थी। लिहाजा अब वो सीरियल्स के साथ साथ
फिल्में भी देखने लगा। ज्यादातर फिल्मों में एक लड़का और एक लड़की के बीच प्यार
जैसे किस्से दिखते थे। दूसरे बच्चे इस उम्र में क्या सोचते थे.. कौन सी बातें उनके
जेहन में घूमती थीं.. इसकी भनक उसे नहीं थी। मगर उसके दिलोदिमाग पर फिल्मों का असर
बहुत ज्यादा पड़ा। एक अनजानी लड़की इसी उम्र में सपनों की रानी बन गई थी, जिससे वो बिल्कुल फिल्मी अंदाज में प्यार करना चाहता था। बात थोड़ी
अजीब है.. मगर ये सौ फीसदी सच है। अब उसे लड़कियां फिल्मों की किरदार जैसी नजर आती
थीं..। लिहाजा वो उनसे घुलमिल भी नहीं पाता था। मगर हर उस लड़की के बारे में
कल्पनाएं बुनता था.. जो कभी कभार उससे प्यार से पेश आ जाती थी। शायद वो अपने उम्र
के लड़कों से बड़ा हो चुका था। इसी उम्र में उसमें तमाम वो अहसास पैदा हो चुके
थे... जो आम तौर पर जवानी की दहलीज पर कदम रखते हुए किशोरों के दिलों में जगते
हैं। बुआ के यहां रहने के लिए उसे अपनी मां से दूर जाना पड़ा था..। सो कहीं न कहीं
ये कमी भी.. उसे ऐसे सपनों में डूबने उतराने के लिए जिम्मेदार रही। कोई लड़की उसे
कुछ खाने को देती..कोई लड़की उससे कॉपी मांग लेती... या फिर कोई लड़की उससे कुछ
देर बात भी कर लेती तो उस दिन के बाद वो उसकी जूलिएट बन जाती। दिन रात खयालों में
बस उसी का चेहरा। यहां तक कि फिल्में देखते वक्त.. हिरोइन की जगह उसका ही चेहरा
दिखता। उस बच्चे के स्कूल में उसकी बुआ की रिश्ते की ननद भी पढ़ती थी.. वो भी उसी
की क्लास में। जाहिर है, उसकी उम्र भी कुछ वही रही होगी।
घर आस पास थे। लिहाजा उसकी पहली महिला मित्र वही लड़की बनी। स्कूल में बातचीत का
सिलसिला चल पड़ा था... एक दूसरे के घर भी आने जाने लगे। खेलकूद से लेकर मारपीट तक
हर जगह वो साथ थे। 9 साल के उस बच्चे की कोरी कल्पनाओं में रंग सा भर गया था..
उसकी कल्पनाओं की प्रेमिका उसे मिल गई थी। फिल्म ठीक ठाक चल रही थी, तभी एक दिन विलेन की एंट्री हुई। दरअसल उसके फूफाजी का ट्रांसफर हो
गया। और अब उन्हें कहीं और जाना था। उसके अलावा उस परिवार के बाकी सारे लोग खुश
थे। नए और अपेक्षाकृत बड़े शहर में रहने की हसरतें हिलोरें मार रही थीं...। मगर वो
बच्चा बेहद उदास हो गया। उसे बाकी कोई चिंता नहीं थी... परेशानी थी तो बस ये वो
अपनी प्यारी दोस्त से दूर हो जाएगा। वो छिप छिपकर रोता था। गुमशुम रहता था,
मगर किसी से कहे तो क्या कहे। शायद वो अपनी उम्र से कोसों दूर
निकल चुका था। उसके अहसास इसी उम्र में जवान हो चुके थे। आखिरकार एक दिन सारा
सामान बांधकर.. । उस शहर से जाना पड़ा। और हमेशा के लिए उसका पहला प्यार अधूरा रह
गया। ऐसा नहीं वो उस लड़की से दोबारा नहीं मिला... मिला मगर सालों बाद जब वो बड़ा
हो चुका था। और अबकी बार वो तमाम अहसास कहीं नहीं थे। क्योंकि बड़े होने के साथ
साथ वो दुनिया की तमाम हकीकतों से वाकिफ हो चुका था। दरअसल, ये लव स्टोरी 9 साल के लड़के की थी। जो जानता तक नहीं था.. कि रिश्ते
की बुआ के साथ भी ऐसे सपने बुने नहीं जा सकते..। यूं तो ये मेरी अपनी ही कहानी है।
मगर अब महसूस नहीं होता..क्या वो मैं ही था,या कोई और...?
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Thursday, November 22, 2012
फीचर फिल्म का शेष भाग 13 साल बाद (?)
(ये लेख टीवी से जुड़ी बचपन की उन यादों को संजोए हुए है, जो मेरी जेनेरेशन के लोगों की जिंदगी में एक ही तरह से रची बसी होंगी। ये लेख मेरे दूसरे ब्लॉग 'बहरहाल' पर 13 सितंबर, 2008 को पब्लिश हुआ था।)
सुबह सुबह नींद खुलती है, और कानों में ‘आ जा आई बहार, ओ...मेरे राजकुमार.. तेरे बिन रहा ना जाए..’टाइप का कोई गाना बिना पूछे चला आ रहा है। जो मिंकू आम दिनों में उठते – उठते ही ट्वायलेट के दर्शन करता था। आज वो ब्रश करने की बजाए सीधे टीवी रुम की ओर बढ़़ जाता है। किचन में चाय बन रही है। मम्मी पिछले आधे घंटे से आवाजें लगा रही हैं... उठो बच्चों... चलो ब्रश करो... चाय बन रही है। मगर अभी तक मिंकू के अलावा दूसरे बच्चे जगे नहीं हैं मिंकू के जगने की आहट मम्मी को मिल गई है। ये बात उनके आवाज लगाने के अंदाज से जाहिर होता है..। अब मम्मी और जोर जोर से आवाज लगा रही हैं। अरे जल्दी से ब्रश करके आओ, चाय ठंडी हो रही है। मगर मिंकू पर इसका कोई असर नहीं है। वो इस कदर टीवी के सामने जम गया है, मानो उसके हटते ही प्रलय आ जाएगी। जब वो टीवी पर नजरें गड़ाए बैठा होता है, उसका मुंह भी खुल जाता है। यकीन मानिए... टीवी प्रेम का ऐसा अद्भुत नजारा अब देखने को नहीं मिल सकता। टीवी रुम में ही पापा भी मौजूद हैं। मगर आज वो अखबार में इस तरह डूबे हुए हैं, मानो महीने भर का खर्चा एक ही दिन में वसूल कर लेंगे। मिंकू को ये दृश्य सरासर नागवार गुजरता है। उसे लगता है मानो टीवी का अपमान हो रहा है। इस बीच मम्मी चाय रख जाती हैं। पापा चाय पी भी लेते हैं। मगर मिंकू को कुछ भी होश नहीं है। एक के बाद एक सदाबहार गाने... जो हर दूसरे तीसरे हफ्ते रिपीट हो जाते हैं। अब तो उसके दिमाग में हर गाने की डीवीडी भी बन गई है। सीन आने से पहले ही उसके जेहन में वो दृश्य कौंध जाता है। खैर, रंगोली... खत्म हो जाती है। अब तक उसे कई बार डांट पड़ चुकी है ब्रश करने के लिए.... लिहाजा वो रंगोली खत्म होने के बाद एक मिनट भी देरी किए बिना ब्रश करने चला जाता है, डर है, अगर ऐसा नहीं किया तो, 9 बजे चंद्रकांता देखने पर पाबंदी ना लग जाए। लिहाजा वो अच्छा बच्चा बन जाता है। और करीब 15-20 मिनट में सारे काम निपटाकर नाश्ता भी कर लेता है। आज के दिन मिंकूसचमुच बदला हुआ है। जो मिंकू स्कूल जाने से पहले और आने के बाद बमुश्किल ही कॉपी किताब को हाथ लगाता है। वो इतवार के दिन जल्दी से काम निपटाकर सुबह सुबह पढ़ने बैठ जाता है। दरअसल, उसे पता है...अगर उसकी ओर से कोई लूपहोल रह गया तो उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। उसेमालूम है, गुड्डी और विक्की भी जग गए हैं... लिहाजा चंद्रकांता तो वो किसी भी कीमत पर देख लेगा...मगर शाम में उसे फिल्म देखने से वंचित होना पड़ सकता है। लिहाजा वो ये दिखाने में कुछ भी उठा नहीं रखता कि वो कितनी पढ़ाई कर रहा है... आम तौर पर पढ़ाई करते हुए वो अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लेता है...मगर आज तो दोनों पल्ले दो तरफ हैं। ताकि घर के लोग उसे पढ़ते हुए तो देखें ही....साथ ही साथ टीवी की भी आवाज उसे साफ सुनाई देती रहे। क्योंकि उसकी सिर्फ नजरें किताब में हैं। जेहन में तो टीवी है। इस बीच वो दूसरे कमरे में लगी घड़ी पर भी नजरे इनायत कर आता है। जैसे ही 9 बजते हैं...उसके भीतर कुछ होने लगता है। ऐसा लगता है, दिलकुछ कहा रहा है...और दिमाग कुछ और कर रहा है। दिल बैठ रहा है... कहीं चंद्रकांता का कोई सीन छूट ना जाए...।मगर दिमाग में तो कुछ और चलरहा है। जिसके आगे वो चंद्रकांता के एकाध सीन की कुर्बानी देने को तैयार है। आखिरकार... आवाजआती है... ‘नौगढ़-विजयगढ़ में थी तकरार... नौगढ़ का था..जो राजकुमार....चंद्रकांता से करता था प्यार...’। ऐसा लगता है उसके पैर बेकाबू हो जाते हैं...और वो पहुंच ही जाता है टीवी रुम में। चंद्रकांता देखने के बाद वो अच्छे बच्चों की तरह नहा धोकर.. बिल्कुल टाइम पर खाना खा लेता है। और एक बार फिर वो अपने कमरे में दिन भर पढ़ने का नाटक करता रहता है... क्योंकि शाम पांच बजे उसे हर हाल में फिल्म देखनी है...कहीं पापा पढ़ाई नहीं करने का बहाना बनाकर उसे फिल्म देखने से रोक ना दें....। इसके लिए वो दिन भर तपस्या करता है। पांच बजे से कुछ पहले ही...हक के साथ वो टीवी ऑन करता है। फिल्म शुरु होती है। अब मिंकू पूरी तरह टीवीमें समा जाता है...कब डेढ़ घंटे निकल जाता है। उसे कोई होश नहीं होता...और सामने आ जाता है। फीचर फिल्म का शेष भाग....बजे। वो बार बार घड़ी देखता है.. कब फिर से शुरु हो पिक्चर। समाचार खत्म हो जाता है औऱ प्रचार शुरु हो जाता है। तभी अचानक एक टेक्स्ट प्लेट आती है.. फीचर फिल्म का शेष भाग थोड़ी देर में। अब वो और भी बेताब हो उठता... टीवी वालों को मन भर भला बुरा कहता है.. और पिक्चर शुरु हो...उससे ठीक पहले बिजली चली आ जाती है। और न जाने कितनी ही फिल्में हैं..जिनका शेष भाग आज 13 साल बीतने के बाद भी वो कभी नहीं देख पाया है।
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