Thursday, November 22, 2012

कुछ क्षणिकाएं...



1  एक रोज़-
  मैं भूल गया-
  अपना नाम,
  अच्छा लगा-
   'नेमप्लेट' से इंसान बनना।

2.
गुमशुदा हुए हैं-
जबसे-
ख़्वाब मेरी आंखों से-
नींद,
बहुत अच्छी आती है मुझे।




3.
अच्छा है -
आइने में दिखती हैं-
सिर्फ शक्लें-
मन जो दिखता-
देखने को ना मिलते-
कहीं आइने।

4.
किसी डस्टबिन सी लगती हैं-
बदनाम गलियां मुझे-
जिनकी वजह से-
मेरा शहर-
देखो-
कितना साफ है!

5.
आदमी -
शहर आता है,
बड़ा आदमी बनने। 
कुछ दिनों बाद-
'इश्तहार' बन जाता है।




1 comment:

उपेन्द्र नाथ said...

nishabd kar diya aapne vivek ji.... Behtarin kshanikae.